तेलगाना संघर्ष की वर्षगांठ पर : मृगिंक < Anniversary of Telngana, as a Seperate State
| 04 Jul 2019

4 जुलाई 1946 को आध्रप्रदेश में तेलगाना संघर्ष आरम्भ हुआ था इस संघर्ष में कम्मुनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसानों ने जोतने वाले को जमीन के नारे के साथ संघर्ष बुलन्द किया। इस आन्दोलन में किसानों ने हथियार उठा कर जमींदारों से जमीन मुक्त करा जोतने वाले किसानों के बांटना आरम्भ किया। आन्दोलन में महिलाओं व पुरुष दोनों की भागेदारी थी। इसी आन्दोलन से प्रभावित अनेक कवियों। में अपनी कलम चली। प्रस्तुत है इस पर दो नज्में। पहले नज्म अजीम तरक्की पसन्द शायर कैफी आजमी की है। तेलंगाना शीर्षक से। यह आन्दोलन के उफान का बहुत ही सुन्दर काव्यात्मक वर्णन करती है। दूसरी गीत ‘’जंग ए आजादी, मख्दूम’ द्वारा लिखा गया है। वे न केवल उच्च कोटि के शायर थे बल्कि खुद तेलगाना संघर्ष के वीर योद्धा भी थे।

यहाँ पर आन्दोलनकारी किसानों ने लगभग दस लाख एकड़ जमीन को मुक्त कराया था जो लगभग तीन हजार गाँवों की थी जिसमें अमूमन तीस लाख लोग रहते थे। जमींदारों, पटलों द्वारा किया जा रहा शोषण समाप्त हुआ था। इसने लिये सशस्त्र गुरिल्ला दस्ते बनाये गये थे। इस आन्दोलन की तीव्रता व सफलता से घबरा कर तथा इस बात से भयभीत हो कि यदि आन्दोलन फैला तो देश भर में फैल जाएगा, सरकार ने भीषण दमन का सहारा लिया व जनरल चौधरी के नेतृत्व में यह भारतीय सेना भेजी गयी। इसका प्रचार किया गया कि यह सेना हैदराबाद के निजाम को भारत में मिला हेतु जा रही है पर ज्ञांतव्य हो कि निजाम के पास तो केवल 1500 घूड़सवार थे जिसमें उसके अंग रक्षक भी शामिल थे। वह क्या लड़ पात। यहाँ पर भारी दमन किया गया जिसमें 5000 क्रांतिकारी व समर्थक गये। 21 अक्ट्बर 1951 को संघर्ष वापस ले लिए गया हम सब के समाने आज भी एक मिसाल है। शोषण मुक्त समाज कृषि क्रांति के रास्ता व समझदारी के लिये। साथ ही यह संघर्ष हमारे शासक वर्ग की पोल भी खोलता है। अधिकांश भूमि हीन गरीब किसान दलित या पिछड़ी जाति के संबंध रखते हैं इस पर दमन के आदेश सर्वसम्मिति से नेहरू मंत्रीमण्डल ने किया था, साथ ही यह संघर्ष व्यापक जनता जिसे आज संघ गिरोह के लोग हिन्दू मान रहे है (दलित/गैर मुस्लिम) की मुक्ति एक मुस्लिम राजा के, जुल्म के खिलाफ था। भारतीय सेना के लिये, जगह-जगह हिन्दू महासभा ने कैम्प लगाये थे और श्यामा प्रसाव मुखर्जी तो मण्त्रीमण्डल में थे ही। यह बात इस बात को स्पष्ट करता है कि वर्ग संघर्ष ही मूल संघर्ष है, और जब यह ही होता है तो अन्य अंतर्विरोध पीछे दूर जाते है।

आज तेलंगना सशस्त्र किसान विद्रोह की वर्षगांठ है। दो नज़्में पेश हैं। पहली मखदूम की है जो न केवल उर्दू के बेहतरीन शायर थे बल्कि इस संघर्ष के योद्धा भी थे। दूसरी कैफी आज़मी की है। दोनों ही बहुत सुंदर हैं।

जंग-ए-आज़ादी
मखदूम मुहिउद्दीन
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले
हम हिन्द के रहने वालों की,
महकूमों की मजबूरों की
आज़ादी के मतवालों की,
दहकानों की मजदूरों
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी

सारा संसार हमारा है
पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्खिन
हम अफरंगी हम अमरीकी
हम चीनी जांबाजाने-बतन
हम सुर्ख सिपाही जुल्म-शिकन
आहन पैकर फौलाद-बदन

ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले
हम हिन्द के रहने वालों की,
महकूमों की मजबूरों की
आज़ादी के मतवालों की,
दहकानों की मजदूरों की
वो जंग ही क्या वो अमन ही क्या,
दुश्मन जिसमें ताराज न हो
वो दुनिया दुनिया क्या होगी,
जिस दुनिया में स्वराज न हो
वो आज़ादी-आज़ादी क्या,
मजदूर का जिसमे राज न हो
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
लो सुर्ख सवेरा आता है,
आज़ादी का आज़ादी का
गुलनगर तराना गाता है,
आज़ादी का आज़ादी का
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
आज़ादी के परचम के तले
हम हिन्द के रहने वालों की,
महकूमों की मजबूरों की
आज़ादी के मतवालों की,
दहकानों की मजदूरों की
ये जंग है जंग-ए-आज़ादी
तेलंगाना
कैफी आज़मी
जइफ माएँ, जवान बहनें,
झुके हुए सिर उठा रही हैं।
सुलगती नजरों की आँच में
भीगी-भीगी पलकें सुखा रही हैं।
लहू भरी चोलियों, फटे आँचलों
से परचम बना रही हैं।
तराना ए जंग गा रही हैं।
जरा पुकार दो बेचैन नौजवानों को।
जरा झिंझोड़ दो कुचले हुए किसानों को।
इधर से कफिला-ए-इंकलाब गुजरेगा।
बिछा दो सीनाए गीती पे आसमानों को।

सफेद पलकों, खिंची हुए झुरियों
में शोले मचल पड़े हैं।
जवाँ निगाहों, जवाँ दिलों से,
हजार तूफाँ उबल पड़े हैं।
भरे हुए दामनों में पत्थर घरों से
बच्चे निकल पड़े हैं।
सब एक ही सम्त चल पड़े हैं।
जता दो कसरे हुकूमत के सब मकीनों को।
बचा सकें तो बचा लेंगे शहनशीनों को।
तरसते रहते हैं जो हाथ आसतीं के लिए।
जलाल में वह उलट देते हैं जमीनों को।

चमक रहे हैं गठीले शानों पे
फावड़े, बेलचे, कुदालें।
उड़ा रही हैं हवा में चिंगारियाँ
तफंगों की गर्म नालें।
वह गोलियाँ के झिजरू लहू
में जो बादशाहों के भी नहालें।
वह गोफनें ताज जो गिरा लें।
यह जस्त रूस के मैदान ने सिखाइ है।
यह फौज चीन से होती दखिन में आई है।
वह उठ खड़े हुए धरना दिए जो बैठे थे।
कि आज शाह के एवान पर चढ़ाई है।
यह शहरयारी, यह ताजदारी
वजूद पर बार हो गए है।
जफा की खूंगर गरीब दुनियाँ
से जफा बेजार हो गए है।
जमीन हर छावनी निगलने पे
आज तैयार हो गई है।
कि भूख बेदार हो गई है।
न सरफे खास की हद बंदियाँ न जागीरें।
हर एक शाम पे टूटी पड़ी है जनजीरें।
वह खेत कौन उड़ाएगा कौन लूटेगा।
उगी हुइ हैं मुंडेरें पर जिनकी शमशीरें।

अवाम का इजतराब है यह,
आवाम् का पेच बताब हे यह।
सितम से दबना हे गैर मुमिकन,
कि हर सितम का जवाब है यह।
समझते हो सत्याग्रह इसको,
जिन्दगी का अताब है यह।
झुका दो सिर कि इंकलाब है यह।

कहाँ जेहाद, कहाँ जद-व-जोहद की मंजिल।
मुफाहमत नहीं पाती जेहाद का हासिल।
हवाए तुंद ने गोन की हे जुल्फे आजादी।
बगावतों ने निखारा है हुसने मुस्तककिल।
हयात अंगडाइ ले के अपना
निजाम अब खुद संभालती है।
जली हुये बसतियों पे तामीर
अक्स शहरों का डालती है।
रविश-रविश को शेगूफाकारी
चमन के साँचे में ढ़ालती है।
कली-कली रंग उछालती है।
लहू से सीना-ए-गीती के दाग धोए हैं।
जगा के खाक की किसमत, शहीद सोए हैं।
कहीं की फौज सही इस तरफ का रूख न करे।
यहाँ जमीन में बम मनचलों ने बोये हैं।

उभरती इन्सानियत की तौहीन है
तश्द्दुद की हुक्मरानी।
जबीने तारीख पर है इक दाग
आज की मुतलकुल अनानी।
तुम्हारे हम राह फतेह व
नुसरत तुम्हारें कदमों में कामरानी।
मुजाहिदो यह है राजधानी।