बढ़ती यौन हिंसा और देर से न्याय मिलने के कारण महिलाओं में बढ़ रही है मानसिक समस्याएं
| 09 Dec 2019

नई दिल्ली, 09 दिसंबर, 2019.. बलात्कार और यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं के कारण महिलाओं में डिप्रेशन, एंग्जाइटी और पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर और यहां तक कि आत्महत्या की प्रवृति जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ रही है।

राजधानी के हैबिटाट सेंटर में इंडियन साइकिएट्रिक सोसायटी की ओर से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर आयोजित तीसरी राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर से आए मनोचिकित्सकों ने बताया कि पिछले कुछ समय के दौरान मनोचिकित्सकों के पास इलाज के लिए आने वाली उन महिलाओं की संख्या में 30 से 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है अतीत में बलात्कार, यौन हिंसा या यौन दुव्यवहार का सामना करना पड़ा है। इन विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के साथ यौन दुव्र्यवहार हुआ है उनमें रक्त चाप, हृदय रोग, अनिद्रा, डिप्रेशन और एंग्जाइटी होने का खतरा दो से तीन गुणा बढ़ जाता है।

इस संगोष्ठी में देश भर के मनोचिकित्सकों एवं मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इस संगोष्ठी में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य, आसपास के वातावरण, यौन हिंसा के मनोवैज्ञानिक प्रभाव, घरों और कार्यस्थलों पर हिंसा एवं मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया।

भोपाल की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. रजनी चटर्जी ने कहा कि घर या बाहर होने वाले यौन दुव्यवहार एवं यौन हिंसा महिलाओं में डिप्रेशन एवं एंग्जाइटी जैसी मानसिक बीमारियों का मुख्य जोखिम कारक है और इस समस्या की रोकथाम के लिए महिलाओं की सुरक्षा में सुधार, शिक्षा एवं जागरूकता, त्वरित न्याय प्रक्रियां एवं महिला अनुकूल सामाजिक वातावरण जरूरी है।

वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं संगोष्ठी की आयोजन अध्यक्ष डा. नीना बोहरा कहती हैं कि महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर विचार करते समय हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का गहरा मानसिक प्रभाव पड़ता है। यौन हिंसा एवं अपराध की शिकार महिलाओं का मनोचिकित्सकीय मदद अवश्य मिलनी चाहिए अन्यथा इसके कारण उनमें ताउम्र के लिए मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

नई दिल्ली स्थित कास्मोस इंस्टीच्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइसेंस सीआईएमबीएस की मनोचिकित्सक एवं संगोष्ठी की आयोजन सचिव डा. शोभना मित्तल ने कहा कि आज के समय में महिलाएं घर और दफ्तर दोनों जगह हिंसा, यौन हिंसा एवं यौन दुव्र्यवहार की षिकार हो रही है। दुर्भाग्य से अनेक महिलाएं डर और समाजिक मर्यादाओं के कारण चुप रहती है लेकिन वह अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं और धीरे-धीरे उनमें मानसिक समस्याएं पैदा होने लगती है। उन्हेांने कहा कि अध्ययनों से पता चलता है कि जो लडकियां और महिलाएं शारीरिक एवं यौन हिंसा का सामना करती हैं उनमें से करीब 50 प्रतिशत लड़कियां या महिलाएं आत्महत्या कर लेती हैं अथवा उनकी हत्या उनके परिवार के लोगों द्वारा कर दी जाती है। बाकी महिलाएं मानसिक वेदना झेलती रहती हैं जिनका गंभीर दीर्घकालिक मानसिक एवं शारीरिक असर होता है।

उन्होंने कहा कि यह देखा जाता है कि यौन हिंसा और बलात्कार की शिकार महिलाओं को देर से न्याय मिलता है या ज्यादातर को कोई न्याय नहीं मिलता है। ऐसे में ऐसी महिलाओं की मानसिक वेदना और गंभीर होती जाती है। उन्होंने कहा कि अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिलने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है हर अपराधी को सजा मिले और वह भी कम समय में।

सीआईएमबीएस के निदेशक डा. सुनील मिततल ने कहा कि यौन हिंसा के कारण होने वाली मानसिक वेदना का दीर्घकालिक असर होता है जिसके कारण डिप्रेषन, एंग्जाइटी, पोस्ट ट्राॅमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर, डिसोसिएटिव डिसआर्डर और यहां तक की आत्महत्या की प्रवृति पैदा होती है। केवल यौन हिंसा से पीड़ित महिलाएं ही नहीं बल्कि ऐसे वातावरण में रहने वाली लड़कियों भी भय और असुरक्षा की भावना से घिरी रहती है और उनमें भी मानसिक समस्याएं होने का खतरा रहता है।

मुंबई की मनोचिकित्सक डा. रूकशीदा सइदा ने कहती हैं कि यह देखा गया है कि जो महिलाएं इलाज के लिए आती हैं उन्हें पुरूषों की तुलना में बेहतर परिणाम देखने का मिलते है लेकिन कम महिलाएं ही मानसिक समस्याओं के उपचार के लिए सामने आती हैं।

केलकाता की मनोचिकित्सक डा. शर्मिष्ठा चक्रवती ने कहा कि महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य पुरूषों से अलग होता है और वे पुरूषों की तुलना में सिजोफ्रेनिया और बाई पोलर डिसआर्डर से अधिक पीड़ित होती है। आज महिलाओं में मादक द्रव्यों का भी प्रयोग बढ़ रहा है। महिलाओं को हार्मोन समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। इसके अलावा उनके साथ घर एवं दफ्तर में यौन दुव्र्यवहार एवं यौन हिंसा होने का खतरा अधिक रहता है। इसके कारण आज महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को अधिक महत्व दिए जाने की जरूरत है।