झारखंड: बाबूलाल के भरोसे चमकने को तैयार भाजपा : नवेन्दु उन्मेष
| 16 Jan 2020

झारखंड में इनदिनों खबरें तेजी से उभर रही हैं कि झारखंड विकास मोर्चा के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी 13 वर्षों के बाद पुनः भारतीय जनता पार्टी में वापसी कर सकते हैं। फिलहाल बाबूलाल कहां है इसका पुख्ता जानकारी किसी को नहीं है। कहा तो यह भी जा रहा है कि वे विदेश

दौरे पर हैं और 16 या 17 जनवरी को वापस रांची लौटेंगे। हालांकि झारखंड विकास मोर्चा की ओर से बाबूलाल के भाजपा में जाने की खबरों का खंडन किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि प्रत्येक विधानसभा चुनाव के पूर्व या पश्चात में उनके संबंध में ऐसी निराधार खबरें फैलायी जाती है। लेकिन खबर यह भी

है कि झारखंड विधानसभा चुनाव से पूर्व बाबूलाल मरांडी की भाजपा अध्यक्ष अमित षाह से तीन बार मुलाकात हो चुकी है। यहां तक कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल चुके हैं। चुनाव के ठीक बाद झारखंड विकास मोर्चा की केंद्रीय समिति को बाबूलाल ने भंग कर दिया। पार्टी की ओर से कहा जारहा है कि 14 जनवरी को खरमास खत्म होने के बाद रणनीति बनायी जायेगी।

दूसरी ओर झारखंड में भाजपा की ओर नजर डाली जाये तो कहा जा सकता है कि राज्य में पार्टी को चमकाने के लिए एक कद्दावर आदिवासी नेता की तलाश है। ऐसे में अगर वह अपने पुराने साथी को फिर से वापस लाना चाहती है तो आश्चर्य की बात नहीं है। यह अलग बात है कि झारखंड विधानसभा का तीन दिवसीय

सत्र बीते दिनों भाजपा विधायकों ने अपने नेता के बगैर गुजार दिये। इसके बाद से भाजपा के प्रदेश संगठन को लेकर अटकलों का दौर और गर्म हो गया है। भाजपा के अंदर और बाहर से बार-बार बाबूलाल मरांडी का नाम लिया जा रहा है। जबकि भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि विधायक दल के नेता का चुनाव खरमास
के बाद किया जायेगा। हालांकि दावे के साथ यह नहीं का जा सकता कि बाबूलाल अगर भाजपा में जाते
हैं तो वे अपनी पार्टी का विलय उसमें करेंगे या अकेल शामिल होंगे। वर्तमान में मोर्चा के पास तीन विधायक हैं। इनमें बाबूलाल समेत प्रदीप यादव और बंधु तिर्की शामिल हैं। बंधु तिर्की भले ही मोर्चा के विधायक है
लेकिन उनका झुकाव मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति

मोर्चा और कांग्रेस की ओर कम नहीं है। इस कारण कहा जा सकता है कि शायद वे
बाबूलाल के साथ भाजपा में जाने को तैयार नहीं होंगे। जहां तक बाबूलाल की छवि का है वे झारखंड में एक कद्दावर आदिवासी नेता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने 2006 में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के

द्वारा उनकी बातें नहीं सुने जाने के बाद पार्टी से इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना ली थी। हालांकि इस पार्टी का प्रदर्शन आरंभ के दिनों में अच्छा रहा हैं। 2009 के चुनाव में पार्टी के 11 विधायक चुनकर विधान सभा में पहुंचे थे जबकि 2014 के चुनाव में 8 विधायकों ने जीत दर्ज की थी।
लेकिन भाजपा ने बाबूलाल की पार्टी को बराबर अपना निशाना बनाया और उनके विधायकों को तोड़ कर पार्टी में शामिल किया। 2019 के विधानसभा चुनाव में बाबूलाल का मोर्चा ही एक मात्र दल था जिसने 81 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने 79 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये थे। इसके बावजूद दोनों दलों का कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा। अब भाजपा को ऐसे मजबूत आदिवासी नेता की तलाश है जो राज्य में पार्टी की डूबती हुई नैया को पार लगा सके। इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर बाबूलाल भाजपा में आते हैं तो पार्टी संगठन में जान डालने का सुखद प्रयास करेंगे क्योंकि वे एक जमीन से जुड़े हुए नेता

हैं। बाबबूलाल ही झारखंड में ऐसे नेता हैं जो किसी भी सीट पर चुनाव लड़कर जीत दर्ज करने में सक्षम हैं। उन्होंने रामगढ़, कोडरमा, राजधनवार, गिरिडीह सीट से लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की। हालांकि खबरें यह भी आ रही है कि बाबूलाल भाजपा में बगैर किसी पद की चाहत के

शामिल होने को तैयार हैं। दूसरी ओर झारखंड की दो सीटों पर राज्यसभा का चुनाव होना है। मार्च में राज्यसभा सांसद परिमल नथवाणी और प्रेमचंद गुप्ता का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। एक सीट पर जीत दर्ज करने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास तो

विधानसभा में स्पष्ट बहुमत है लेकिन भाजपा के पास जीत दर्ज करने के लिए न तो कद्दावर आदिवासी नेता है और न ही पूर्ण मत। ऐसी स्थिति में भाजपा बाबूलाल को पार्टी में शामिल कर राज्यसभा सीट जीतने का प्रयास अवश्य करेगी। पार्टी को मालूम है कि यह काम बाबूलाल अपने विरोधियों को मिलाकर
आसानी से कर सकते हैं। यह भी संभव है कि भाजपा उन्हें ही राज्यसभा में
भेजने की सोचे।
नवेन्दु उन्मेष
सीनियर पत्रकार संपर्क-9334966328