पदोन्नति में आरक्षण के फैसले को भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर ने सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष बेंच में दी चुनौती। सुनवाई के लिए हो सकता है संवैधानिक बेंच का गठन।
| 18 Feb 2020

पदोन्नति में आरक्षण के फैसले को भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर ने सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष बेंच में दी चुनौती। सुनवाई के लिए हो सकता है संवैधानिक बेंच का गठन।

नई दिल्ली। गत 7 फरवरी को पदोन्नति में आरक्षण पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मामला सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष बेंच के पास पहुंच गया है। अखिल भारतीय भीम सेना के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष नवाब सतपाल तंवर ने पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर कर संवैधानिक बेंच का गठन करके सुनवाई करने की मांग की है।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई है जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति/ जनजाति, पिछड़ा वर्ग व अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह उक्त वर्गों को पदोन्नति में आरक्षण दें या ना दें। आरक्षण देने पर राज्य सरकारें बाध्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ देश भर के दलित समुदाय व पिछड़ा वर्ग में गुस्से का माहौल है। सामाजिक संगठन अखिल भारतीय भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष बेंच से मांग की है कि पूरे मामले पर सुनवाई के लिए संवैधानिक बेंच का गठन करके फैसले पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अखिल भारतीय भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर ने भीम सैनिकों के साथ रविवार को जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से शाहीन बाग तक विरोधस्वरूप रैली निकाली और आरक्षण को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करने की केंद्र सरकार से मांग की। भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर ने पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष बेंच में चुनौती दी है। समीक्षा याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान की मूल भावना का उल्लघंन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि फैसले में संविधान के अनुच्छेद 16(1) और 16 (4) के तहत अवसरों में समानता का उल्लघंन किया गया है। यह फैसला एम नागराज संविधान पीठ के फैसले के बिल्कुल उलट दिया गया है। फैसला अनुच्छेद 16 (4), 16 (4ए) में दिए गए प्रावधानों का लागू नहीं करता जिससे संविधान की मूल भावनाओं का हनन होता है। अनुच्छेद 16 रोजगार व किसी कार्यालय के अधीन नियुक्ति से संबंधित मामलों में अवसरों में समानता को अनिवार्य बनाता है। फैसले में संवैधानिक प्रावधानों को नजरंदाज किया गया है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 335 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान की आशाओं पर खरा नहीं उतरता। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था स्वरूप अनुच्छेद 15 (6), 16 (6) को भी नजरंदाज किया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और सदियों से जातीय शोषण का शिकार हुए अनुसूचित जाति/ जनजाति, पिछड़ा वर्ग व अन्य पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए संविधान में आरक्षण की विशेष व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रमोशन में आरक्षण अनुच्छेद 46 को बाधित करता है। मुकेश कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य के उक्त फैसले में संविधान में दिए गए प्रावधानों पर रोक लगाता है जोकि न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए प्रमोशन में आरक्षण पर फैसले के लागू हो जाने से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों और सरकारी नियुक्तियों में भी जातीय उत्पीड़न झेल रहे अनुसूचित जाति/ जनजाति, पिछड़ा वर्ग व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के रोजगार में समानता के अवसर हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। आर्टिकल 137 के तहत दायर याचिका में प्रमोशन में आरक्षण को बरकरार रखने की मांग की गई है। साथ ही भीम सेना चीफ़ नवाब सतपाल तंवर ने केंद्र सरकार से मांग की है कि प्रमोशन में आरक्षण को संविधान की 9वीं अनुसूची में डाला जाए जिससे इसपर न्यायिक हस्तक्षेप बंद हो जाए।