मातृ सदन की गंगा ? या गंगा का धंधा
| 20 Feb 2020

मातृ सदन की गंगा ? या गंगा का धंधा

जन उदय : गंगा सफाई और आस्था का धंधा बनता जा रहा है या लगभग बन गया है वैसे फेसबुक की निचे दी गई खबर के अनुसार देखे पहले

गंगा की निर्मलता, अविरलता और खनन माफिया से उसकी मुक्ति के लिए स्वामी शिवानंद के नेतृत्व में हरिद्वार का मातृ सदन पिछले कई दशकों से संघर्षरत रहा है। इस सिलसिले में आश्रम ने कई कुर्बानियां दी हैं। गंगा को खनन माफियाओं से बचा लेने और उसकी सफाई के लिए एक कारगर नीति और क़ानून बनाने की मांग लेकर कुछ सालों पहले लगातार 114 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे आश्रम के स्वामी निगमानंद को अस्पताल ले जाकर प्रशासन के संरक्षण में खनन माफिया द्वारा मार डाला गया। इस हत्या की जांच सी.बी.आई कछुए की गति से कर रही है। पिछले साल आश्रम में अनशन पर बैठे पर्यावरण के देश के सबसे बड़े योद्धाओं में एक, आई.आई.टी, कानपुर के पूर्व प्राध्यापक 86-वर्षीय डॉ जी.डी अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद की मृत्यु एक सामान्य घटना नहीं, राज्य और केंद्र सरकारों की उदासीनता और संवेदनहीनता का चरम था। गंगा के लिए अनगिनत बार तपस्या पर बैठे स्वामी शिवानन्द की हत्या की लगातार कोशिशें होती रही हैं। अभी आश्रम में एक युवा साध्वी पद्मावती 68 दिनों से और ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद 22 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। आजतक प्रदेश या केंद्र सरकार का कोई भी प्रतिनिधि उनका हाल जानने या गंगा को माफियाओं के कब्जे से मुक्त करने का आश्वासन लेकर नहीं आया। क्या सरकार पर्यावरण के इन दोनो योद्धाओं की भी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है ?

स्पष्ट है कि निर्मल गंगा का संकल्प लेकर सत्ता में आई और गंगा की सफाई के नाम पर अरबों रुपए डकार जाने वाली केंद्र सरकार और माफियाओं से हर महीने करोड़ों की रकम उगाहने वाली उत्तराखंड की सरकार को गंगा की कितनी चिंता है। आम जनता को गंगा में अपने पाप धो लेने भर से मतलब है। उस मैली गंगा में जिसका पानी हमारे कुकर्मों से अब न पीने लायक रहा, न नहाने लायक और न खेतों की सिंचाई के लायक। किसी को यह चिंता नहीं कि अगर गंगा नहीं रही तो न उत्तराखंड रहेगा, न उत्तर प्रदेश, न बिहार और न बंगाल। """"

दोस्तों जैसा ये आपने खबर पढ़ी लेकिन अगर आपको ये कहा जाए की जितने भी लोग गंगा की सफाई और गंगा बचाओ आन्दोलन से जुड़े है वो लोग गनगा के नाम पर धंधा कर रहे है अपनी राजनीती कर रहे है तो आपको बहुत धक्का लगेगा ,
पहली बात जब जी डी आगरवाल गंगा बचाओ आन्दोलन कर रहे थे उनसे मै निजी तौर पर मिला उनका गंगा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण मुझे हमेशा अच्छा लगा लेकिन दुसरे ही पल वो भगवान शिव से शक्तिया मांगने लग जाते थे , और गंगा के अपराधियो को भस्म तक करना चाहते थे , एक वैज्ञानिक ऐसी बात करे थोडा अजीब लगता था
दूसरा गंगा की सफाई में कुछ साधू संतो को छोड़ बाकी साधू संत पांडा समाज बिलकुल भी विरुद्ध है क्योकि जी डी वशिष्ट ने मेरे रहते एक बार सभी पंडो और साधू समाज से कहा कि वो लोग खुद लोगो को कहे की लोग हरिद्वार या गंगा न आये ताकि गंगा की सफाई हो सके , तो इस पर खुद साधू समाज ने एक बहुत बड़ा आन्दोलन और विरोध पदर्शन अग्रवाल जी के खिलाफ किया था

इसके अलवा कुछ लोग गंगा बचाओ आन्दोलन को सिर्फ इसलिए ज़िंदा रखना चाहते है ताकि इसके नाम पर खनन पूंजीपतियो से एक मोटी रकम की उगाई हो सके ,

बाकी सरकार की तरफ से आने वाले विभिन्न फण्ड तो है ही , तो कुल मिला कर ये सिर्फ एक धंधा बन गया है और जो लोग सच में गंगा बचाना चाहते है वो सिर्फ इन राजनीतियो के शिकार ही होते है या इस्तेमाल कर लिए जाते है बाकी कुछ हो नहीं पाटा भावुक लोग आन्दोलन में लगे रहते है खेल खेलने वाले खिलते रहते है