भारत का धार्मिक नफरती कोरोना वायरस: East Delhi Right Conspiracy
| 27 Feb 2020

चीन में फैला कोरोना वायरस जिसके कारण चीन में हजारो लोगो की जान चली गयी पूरा विश्व कोरोना वायरस के प्रकोप से डरा हुआ है। भारत चीन का पड़ोसी मुल्क होते हुए भी इस वायरस से बच गया। लेकिन भारत की सत्ता में विराजमान संघ परिवार द्वारा फैलाया गया धार्मिक नफरती वायरस चीन के कोरोना वायरस से भी ज्यादा खतरनाक वायरस है। चीन के कोरोना वायरस से सिर्फ जान का नुकसान हो रहा है, बहुत जल्द चीन का समाज इस वायरस को हरा कर फिर एक बार उभर कर मुख्य धारा में आ जायेगा। लेकिन भारत मे फैले इस धार्मिक नफरती वायरस से जान-माल के साथ-साथ आम जनता में वो नफरत की खाई बन रही है जिसको पाटने में बरसो लग जायेंगे। संघ परिवार अपने जन्म से ही ऐसे नफरती वायरस छोड़ रहा है।

पिछले दो महीने से पूरे मुल्क में नागरिक संशोधन अधिनियम (CAA) राष्ट्रीय रजिस्टर नागरिकता (NRC) व NPR के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। बहुमत संख्या में मुस्लिम इन आंदोलनों में शामिल रहे है। क्योकि इस कानून से मुख्यत मुस्लिम ही ज्यादा प्रभावित होगा। मुस्लिम ही सत्ता के निशाने पर है। वैसे गरीब हिन्दू, सिख, ईसाई, आदिवासी सब इसके कारण समस्या से गुजरेंगे। आन्दोलन की शुरुआत में कुछ जगह छोड़ सब जगह आन्दोलन शांति पूर्वक रहा है। 2 महीने के आन्दोलन के दौरान पूरे देश में कही भी किसी मंदिर को या किसी की भी धार्मिक जगहो को एक कंकड़ भी नही मारा गया। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने आंदोलनकारियों पर गोलियां चलवाई जिसमे 20 के आस-पास आंदोलनकारी शहीद हो गए। सैकड़ो जेल में गए।

दिल्ली के शाहीन बाग में इसी दौरान महिलाओं ने मोर्चा संभाला, एक ऐसा मोर्चा, एक ऐसा आन्दोलन देश ने पहली बार देखा था। ऐसा आन्दोलन जिसने पूरे मुल्क को एक नई दिशा दी। ऐसा आन्दोलन जो फासीवाद सत्ता के आंखों में सुई की तरह चुभने लगा। एक ऐसा आन्दोलन जिसका नेतृत्व महिलाएं कर रही थी। वो महिलाएं जिनको हमारा भोंपू मीडिया और संघ परिवार बुर्के में कैद गुलाम औरते की संज्ञा से नवाजता रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग को देखते हुए पूरे मुल्क के प्रत्येक कोने में ऐसे शाहीन बाग की शुरुआत हो गयी। अकेले दिल्ली में दर्जनो जगह शाहीन बाग हो गए। इन सभी शाहीन बागों में सभी धर्मों के लोगो ने अपनी एकजुटता दिखाई। सत्ता ने शाहीन बाग के खिलाफ जितना झूठा प्रचार किया, मुल्क से एकजुटता की खबर उतनी ही ज्यादा आ रही थी। ये 2 महीने कपकपाती सर्दी के महीने थे। इन 2 महीनों में कितनी बार बारिश हुई। लेकिन शाहीन बाग की महिलाओ ने साबित कर दिया कि महिला से मजबूत कोई नही हो सकता है। वो सर्दी व बारिश में भी मोर्चे पर डंटी रही। महिलाओं के इन होंसला से डर कर मुल्क का गृहमंत्री बेहूदा ब्यान देता है, "वोट का बटन इतनी जोर से दबाना की उसका करंट शाहीन बाग में लगे"
इसी दौरान दिल्ली में चुनाव का शंखनाद हुआ। भाजपा ने अपने पूरे चुनाव अभियान में दिल्ली चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नही छोड़ी। वैसे भाजपा में नैतिकता है नही लेकिन फिर भी चुनाव की अपनी एक नैतिकता होती है इस चुनाव में भाजपा ने चुनावी नैतिकता को भी तार-तार कर दिया। "गोली मारो सालो को" से लेकर "शाहीन बाग करंट जाए" शाहीन बाग नही ये "मिनी पाकिस्तान" "दूसरा कश्मीर बनता शाहीन बाग" वोटिंग के दिन को भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मुकाबला या छोटे से लेकर बड़े नेताओं का ये खुले आम बोलना की जो देशभक्त होगा वो देशभक्त पार्टी को वोट देगा और गद्दार जो होगा वो देशद्रोही पार्टियों को वोट देगा। नफरत का जहर इस चुनाव में नदी कि तरह बहाया गया। लेकिन इस नफरत के खिलाफ शाहीन बाग मजबूती से खड़ा था। वो अपनी जड़ें अंदर ही अंदर मजबूत कर रहा था। ऐसी जड़े जिसको हिलाना सत्ता के लिए नामुकिन हो रहा था।

सत्ता ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया सुप्रीम कोर्ट ने 3 वार्ताकार नियुक्त किये। तीनो वार्ताकार भी शाहीन बाग को टस से मस नहीं कर सके। वार्ताकारों के कारण शाहीन बाग की जड़े मजबूत ही हुई। इस मजबूत होते शाहीन बाग से हिंदुत्वादी कट्टरपंथी ही नही तिलमिला रहे थे मुश्लिमो के अंदर का भी कट्टरवादी धड़ा तिलमिलाया हुआ था। उसी तिलमिलाहट का नतीजा वारिस पठान का ब्यान 15 करोड़ बनाम 100 करोड़ दिया गया। ये ब्यान काफी था हिंदुत्वादी कट्टरपंथियों के लिए व उसके मीडिया के लिए। अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता व बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता एक दूसरे को खाद पानी देने का काम करती है। उसने यहां भी अपना काम किया।
जाफराबाद में रोड ब्लॉक करना वारिस पठान के ही वारिसों द्वारा किया गया कृत्य था। दंगो की स्क्रिप्ट बनाने में दोनों तरफ के साम्प्रदायिक लोग शामिल होते रहे है और इस दंगे में भी ये लोग शामिल रहे है।
अभी पिछले 2 दिनों से दिल्ली में सत्ता के गुंडों ने जिनका नेतृत्व कपिल मिश्रा कर रहा है। कितनी मस्जिदों, मजारों को आग के हवाले किया है वो शोशल मीडिया पर आ रहे वीडियो से साफ दिख रहा है। पुलिस दंगाई के साथ मिली हुई है ये भी साफ-साफ दिख रहा है। पुलिस पहले दिन से ही सरकारी गुंडे के तौर पर आन्दोलन के खिलाफ काम करती रही है। पुलिस और दंगाईयों का गठजोड़ तब साफ दिख जाता है तब "जय श्री राम" वन्देमातरम या भारत माता की जय का नारा लगाती भीड़ बोलती है कि पुलिस भी हमारे साथ खड़ी है मारो मुल्लो को, ये एक वीडियो में नही अनेक वीडियो में साफ दिख रहा है।
इस सत्ता ने कितना जहर भर दिया है बहुसंख्यक हिन्दुओ के दिमाक में अल्पसंख्यक मुश्लिमो के खिलाफ ये इन दंगों में दिख रहा है। ये ही जहर दलितों, आदिवासियों के खिलाफ भी समय-समय पर दिखता रहता है।
एक वीडियो जो बहुत ही भयानक है। ऐसा वीडियो जिसको देखते ही एक साधारण इंसान की रूह कांप जाए। वीडियो में कुछ घायल मुस्लिम नौजवान जमीन पर पड़े है, जिनको पुलिस ने बर्बरता से पीटा है। पुलिस की अति बर्बरता देखिए, ऐसी बर्बरता जो मुल्क के अलग-अलग कोने में लिंचिंग करने वाली भीड़ करती है।
घायल पड़े हुए नौजवानों को अस्पताल में ले जाने की बजाए पुलिस उनसे राष्ट्रगान गवा रही है। वो जमीन पर गिरे हुए राष्ट्रगान गा रहे है। एक पुलिस वाला घायल के लठ की खोद मारकर कह रहा है बोल हमे चाहिए आजादी।
ये अति से अति बर्बर चेहरा है। ये लोकतंत्र की पुलिस नही है, ये हिंदूवादी सत्ता की पुलिस है। ये हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मुल्क की पुलिस नही है।

आप फूल देकर सोच रहे है थे कि पुलिस सुधर जाएगी। वो लोकतंत्र की पुलिस बन जाएगी। कभी नही, क्योकि ये पुलिस मानवीय नही है। ये पुलिस मुस्लिम, दलित, महिला विरोध से अंदर तक भरी हुई है। ये मानसिक बीमार पुलिस है। ये पुलिस मौका देखती है कब दलित, महिला, मुस्लिम फंसे ताकि उनको कुचला जा सके। पूरे मुल्क में जहाँ भी इनको मौका मिला इन्होंने बेरहमी से कुचला है।
आज दिल्ली जल रही है। गरीब लोगों के घर जलाए जा रहे है। महिलाओं को लिंग निकाल कर कहा जा रहा है ले लो आजादी

एक वीडियो में एक भीड़ एक घायल नौजवान को अर्धनंग करके घसीटती हुई ले जा रही है। भीड़ ने एक पत्रकार को पिट दिया बाद में उसका नाम पूछा गया तो मालूम हुआ वो हिन्दू है तो छोड़ा गया कि अपना हिन्दू भाई है छोड़ो छोड़ो
जब ऐसे स्टेज पर समाज आ जाता है तो वो बहुत ही भयंकर होता है। उस समाज को बचा पाना नामुमकिन हो जाता है। ये संघ द्वारा उसकी सत्ता द्वारा फैलाया गया नफरती वायरस है जिसका इलाज भविष्य में नही दिखाई दे रहा है। क्योकि हमारे पास ऐसा कोई सामाजिक-राजनीतिक डॉक्टर जमीन पर नही है जो इस वायरस को खत्म करने की दवाई बना सके।

बहुत बुरे दौर से दिल्ली गुजर रही है। इस नफरती वायरस की फैक्टरी के खिलाफ दिल्ली की जनता ने जिस महामानव को चुना था वो इनसे भी बड़ा ड्रामेबाज निकला
दिल्ली का मुख्यमंत्री कुछ करने की बजाए ड्रामे कर रहा है। प्रभावित इलाकों में जाने की बजाए राज घाट पर जाकर मोन व्रत करना ड्रामा ही है। राजनीतिक पार्टियों की तरफ से कोई उम्मीद की किरण दिखाई नही दे रही है।
लेकिन जनता की तरफ से बहुत जगह से सकूं भरी खबरे जरूर आ रही है। कुछ कालोनियों में लोगो ने इकठ्ठा होकर जिसमे सभी धर्मों के लोग शामिल है जरूर दंगाइयों के खिलाफ मोर्चा संभाला है। दिल्ली के ब्रिजपुरी इलाके में लोगो ने प्रोटेस्ट किया है नारे लगाए है कि हमारी कालोनी को नही जलने देंगे, हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई

इसके अलावा भी बहुत सी जगहो पर सिखों, दलितों ने मुश्लिमो को बचाने के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिये है।
इस बुरे दौर में देश के प्रगतिशील बुद्विजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, लेखकों, वकीलों, शिक्षकों, पत्रकारों और सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों को इकठ्ठा होकर जल्द से जल्द दंगे से प्रभावित बस्तियों में जाकर सद्भावना के लिए धार्मिक कट्टरपंथियों के सामने पीड़ितों को बचाने के लिए दीवार बन कर खड़ा होना पड़ेगा।