सबसे पहले उजला हो अपना मन : ऋतु
| 23 Sep 2016

आज के युग में भाषण देने की कला में सब माहिर हैं परन्तु कितने लोग हैं जो वास्तव में उसे अपने जीवन में उतारते हैं। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो बहुत ज्ञान की बातें करते हैं। ज्ञानी महापुरुषों की कोई कमी नहीं और आम आदमी इनसे प्रभावित होकर उन्हें गुरु मान लेता है। सिर्फ साधु का चोला ओढ़ लेने से कोई साधु नहीं हो जाता है। औरतें इनके चरण स्पर्श करती हैं और ये गुरू उनके सौन्दर्य का मन ही मन अवलोकन करते हैं। बात करने के बहाने छूना और बहला फुसलाकर अपना उल्लू सीधा करने में ऐसे लोग माहिर होते हैं। आश्चर्य है कि महिलाओं में खतरा सूंघने की क्षमता होती है पर ऐसे मामलों में वह कभी काम नहीं करती है। औरतों को धर्म का ज्ञान देकर अपने वश में करना ऐसे लोगों को खूब आता है।
एक ऐसे ही महापुरुष मांसाहारियों के खिलाफ खूब आग उगलते हैं। उनके विचार में यह आहार ना होकर व्यक्तित्व विश्लेषण का आधार है। छोड़िये बड़ी बड़ी डिग्रियां लेना जनाब जब ऐसी महान शख्सियत मौजूद हो जो बिना देखे बता सकती हो कि सभी मांसाहारी पापी होते हैं। बडे़ से बड़ा न्यायाधीश इनके समक्ष फेल है। यूरोप और अमेरिका के लोगों का तो मुख्य आहार ही यही है। अब वहां बसे लोग यह अहम जानकारी नहीं रखते कि मांस खाने वाले पापी होते हैं वरना वो लोग कबसे मांस खाना छोड़कर इन महाशय के चेले बन जाते। तरक्की पसंद देश कहां जानते हैं कि यह घोर पाप है। वे बेचारे दिन रात काम कर मंगल तक पहुंच गए और ये जनाब यहां भाषण देते रह गये। अब इतने ज्ञानी महापुरूष का यहां क्या काम। मेरे विचार से इन्हें इस ज्ञान का प्रचार अमेरिका में करना ही चाहिए। पर मैं एक बात बताना भूल गयी कि ये जनाब चुगलखोरी कर अच्छे खासे लोगों की घर गृहस्थी ज़रूर बिगाड़ते हैं। व्रत व पूजा पाठ दिन रात करते हैं परन्तु सच्चा धर्म अभी तक सीख नहीं पाये हैं।
मांस खाने से नहीं शायद उल्टी सीधी बातें बनाने से ज़्यादा नुकसान होता है। खान पान व्यक्तिगत चुनाव है जिसका शारीरिक नुकसान नहीं होता पर मन भर मैल रखकर दूसरों के विषय में गलत बातें करने से मानहानि अवश्य होती हैऔर अपने ही कर्म खराब होते हैं।
ज्ञान का सदुपयोग अच्छे कामों में ना करके लच्छेदार बातें करना कहां उचित है? ऐसे लोग कान भर कर अपना काम चला लेते हैं पर अनजाने में कितनी बद्दुआएं इकट्ठी कर लेते हैं। मन उजला रख कर अगर सबको कुछ सिखाया जाये जो मूल्यवान व तार्किक हो तो कौन आपसे प्रभावित नहीं होगा। महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि किसी को सिखाने से पूर्व स्वंय उस बात का पालन करें अन्यथा उस बात का महत्व ही खत्म हो जाता है। गुरु बनकर विश्वास जीतना बेहद आसान है पर उसे कायम रख पाना हर किसी के बस की बात नहीं। असली गुरू को स्पर्श करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और ना ही बदला निकालने की भावना उनके अंदर होती है। मौका पड़ने पर किसी को अपमानित करना या उनकी कमज़ोरी जगजाहिर करना सिर्फ गलत इंसान ही करते हैं। अच्छे लोग बुरी बातें भूल जाते हैं। मन साफ रखकर आगे बढ़ते हैं। सच कभी ना कभी सामने आकर ही रहता है तो क्यों झूठ का सहारा लेकर अपने को श्रेष्ठ साबित करना? आपमें जो भी गुण हैं उनकी कद्र समस्त संसार करेगा बस पहले साफ मन से बात तो कीजिये। मीठे बोलने के साथ अपनी अंतर्आत्मा भी तो साफ कीजिये। सर्प भी बिना कारण नहीं डंसता। आप मनुष्य हैं कम से कम जिस काम को करने इस संसार में आये हैं वो तो पूरा करें। नफरत ना फैलाकर हम यदि मन को सुंदर बना लें तो यही श्रेष्ठ कर्म होगा।