पुरुषों पर अत्याचार : कौन करेगा न्याय : ऋतु
| 08 Oct 2016

मैं आपके समक्ष आज पुरुषों की कुछ अनकही समस्याएं रख रही हूं और फैसला आप पर छोड़ देती हूं।
शक्तिशाली कहे व समझे जाने वाले पुरुष भीतर से एक छोटे बच्चे के समान होते हैं। भावनात्मक रूप से वे भी उतने ही आहत होते हैं जितनी कि हम महिलाएं। पैदा होते ही उनमें पुरुष होने का अहं महिलाएं ही भरती हैं। रोने पर टोकना और ताना देना हम ही उन्हें सिखाते हैं। थोड़ा बड़ा होते ही घर की सुरक्षा का भार उनके नाज़ुक कंधों पर आ जाता है। पुरुष मानसिकता को समझने के लिए हम कभी पहल नहीं करते हैं।
हमारे हिसाब से उनके भीतर दिल होता ही नहीं है। कुछ घरों में पुरुष कभी खुल कर अपनी भावना प्रकट ही नहीं कर सकते हैं। कमाने की पूरी ज़िम्मेदारी अकेले पुरुष को सौंप दी जाती है। सुबह थैला उठाकर एक आम पुरुष जब घर से निकलता है तो उसे पता होता कि अपने परिवार की कितनी ज़रूरतों का बोझ उसने लाद रखा है। आम आदमी की तनख्वाह ज़रूरतें पूरी करते करते खत्म हो जाती हैं।
क्या यह अत्याचार नहीं कि कमाने के लिए एक व खाने के लिए बहुत से लोग होते हैं। हर वक्त ज़रूरतें पूरी करते हुए पुरुष असमय बूढ़ा और कमज़ोर होने लगता है। औरतें उसके घर आते ही अपनी छोटी से छोटी समस्या उसे सुनाने बैठ जाती हैं। हद तो तब होती है जब वो थकान मिटाने उस वक्त टीवी देखने बैठ जाये या लेट जाये। फौरन हम महिलाएं उन्हें घर के प्रति उदासीन होने का खिताब दे डालती हैं। पुरुष घर पर अपनी मर्ज़ी से फोन नहीं कर सकते, चैटिंग तो गुनाह हो जाती है। महिला मित्र होना तो एक साधारण पुरुष के लिए मानो गाली है।
आप और हम चाहते हैं कि पुरुष लाखों कमाये पर सब कुछ हमें सौंप दे। एक पान भी खरीदने के लिए उसे अपनी पत्नी से पैसे मांगने पड़ते हैं मानो उसी के पैसे आप उसे भीख में दे रहे हों। यदि वो कुछ खरीद ले तो फौरन उस पर फिज़ूलखर्ची के इल्ज़ाम लग जाते हैं। किसी मित्र को चाय काफी पिला दे तो हम उससे हिसाब मांगने लगते हैं।
महिलाएं दफ्तर में पुरुषों से बात कर लेती हैं , रोके जाने पर समानता की बातें की जाती हैं। महिलाओं के पति तुरंत अत्याचारी घोषित कर दिये जाते हैं। यदि पुरुष महिला मित्र बना ले तो घर , दफ्तर सब जगह उसे ताने सुनाये जाते हैं। उसे घर तोड़ने की पहल समझ लिया जाता है।
महिला सहयोगी हर दफ्तर में होती हैं। पुरुष साथ काम करेगा तो हंसेगा भी, खाना भी खायेगा और स्वस्थ मित्रता होगी तो अपनी समस्याएं भी बतायेगा। उसे फौरन गिरे हुए चरित्र का समझना कहां तक सही है? क्या वाकई पारिवारिक मूल्य इतने हल्के होते हैं जिन्हें सिर्फ महिलाएं संभालना जानती हैं? क्या सभी पुरुष घर तोड़ने के लिए सदा तैयार बैठे रहते है? क्या वे अपनी ज़िम्मेदारी बिल्कुल नहीं समझते?
पुरुष सारा दिन लोगों से माथापच्ची करता है, थक हार कर धूल मिट्टी से सनकर घर पहुंचता है और हम उसे दो घड़ी सुकून की नहीं देते हैं। क्या महिलाओं की ज़िम्मेदारी बस खाना बनाने व घरेलू कामकाज निबटाकर पंखे की हवा खाने की ही है? क्या पत्नी होने के नाते घरेलू खर्चे पूरे करने का रोना रोने के अलावा आपने कभी अपने पति का हाथ पकड़ उससे तकलीफ पूछी है? क्या आप ज़रुरतें पूरी करने के लिए प्रेशर ना देकर आमदनी बढ़ाने के घर बैठे उपाय नहीं कर सकते? कुछ महिलाएं प्रेरित करती हैं कि उनके पति ऊपरी कमाई करें ताकि वे पड़ोसन को अपना नया हार या सोफासेट दिखा सकें। कम कमाई वाले पुरुष को अक्सर कम इज़ज्त मिलती है। क्या कमाई बढा़ने का एक भी सही उपाय ऐसी महिलाएं करती हैं? डिमान्ड करते करते कभी यह भी सोचती हैं कि कम आय में उनका पति वह पूरा कैसे करेगा? क्या यह पुरुषों पर अत्याचार की श्रेणी में नहीं आता है? आगे बढ़ उपाय ढूंढ़ने की बजाये पुरुषों पर मानसिक दबाव बनाना कहां तक सही है?
इसी तरह बहुत सी माएं बेटों को बहुओं के लिए भड़काती हैं। बात बात पर घर छोड़ने की धमकी देना, खाना छोड़ देना , मानसिक प्रताड़ना है। पुरुष को बिना वजह कोसना, उन पर झूठे आरोप लगाना भी गलत है। जैसे कुछ महिलाएं शोषण की शिकार होती हैं और साबित नहीं कर सकतीं वैसे ही कुछ पुरुष भी शोषण के शिकार होते हैं, कभी अपनी पत्नी, कभी मां तो कभी बच्चों से। कर्ज़ लेकर सामाजिक कार्य निबटाते कई पुरुष आपको अपने आसपास मिल जायेंगे। क्या उनके बच्चों ने आगे बढ़कर यह कहा है कि उनके लिए कर्ज़ ना लें। वे स्वंय इस पर अंकुश लगा कर अपने पिता को सुकून क्यों नहीं देते?
अब एक ऐसी परेशानी का ज़िक्र कर रही हूं जिस पर अमूमन औरतें कभी ध्यान नहीं देती हैं। शारीरिक ज़रूरत पूरी होना एक पति का हक है अधिकांश औरतें चालीस पार होते ही खुद को बूढ़ा घोषित कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ लेती हैं। पति यदि इच्छा ज़ाहिर भी करे तो उसे ठरकी, पापी कहा जाता है और उम्र का लिहाज़ रखने की हिदायत भी दे दी जाती है। सत्संग और दिन रात पूजा पाठ में लगी औरतें सांसारिक धर्म छोड़कर पुरुषों के प्रति उदासीन हो जाती हैं। कुछ पुरुष अपनी इच्छा दबा लेते हैं तो कुछ इसे बाहर पूरा करने के गलत रास्ते ढूंढ़ते हैं। आखिर असली गुनहगार कौन है?
इन सभी सम्सयाओं से जूझता पुरुष कभी कभी हार मान लेता है। हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक आम बात हो गई है। तब यही घर परिवार के लोग घबरा जाते हैं इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाते हैं।
कृप्या पुरुषों की भी भावनाओं को समझें क्योंकि वे भी इंसान हैं सिर्फ एटीएम मशीन नहीं।
कभी हाथ पकड़कर उनका दर्द भी बांटिये ना। जिनके बिना घर गृहस्थी की गाड़ी अधूरी है , उनके भी आंसू बह जाने दीजिए ना।
मां,पत्नी,बेटी,बहन अगर दोस्त बन जायें तो पुरुषों को बाहर दोस्त ढूंढने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
आइये पुरुषों के प्रति अपनी सोच बदलें। सहयोगी बनें ताकि वे भी महिलाओं की तरह लम्बी उम्र का आनंद ले पायें। आइये हम सब उनकी मुश्किल बांट लें ताकि वे भी ज़िदंगी को भरपूर जी पायें।